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मिर्च
एन.पी 46-ए: यह एक अधिक उपज देने वाली व दार्मियाने आकर के फलों वाली किस्म हैं। हरी मिर्च की औसत पैदावार 40 क्ंविटल प्रति एकड़ है।
पूसा ज्वाला:- यह एक अधिक उपज देने वाली व दर्मियाने आकार के फलो वाली किस्म है। पौधे छोटे तथा फलों से भरे होते हैं। हरी मिर्च की औसत पैदावार 30-35 क्ंविटल प्रति एकड़ है।
पन्त सी- 1: इस किस्म में फल ऊपर की तरफ लगते हैं। रोपाई के 60-65 दिनों के पश्चात् फल लगने शुरू हो जाते हैं। जो 95 से 100 दिनों के बाद तुड़ाई के योग्य बन जाते हैं। हरे फलों की लम्बाई 5 से 8 सैंमी होती है। इस किस्म पत्ती मरोड़ विषाणु व मौजेक रोगों के प्रति कुछ हद तक प्रतिरोधी है।
हिसार शक्ति (एच.सी.-44):- अगेती पकने वालीण् मसाले कीण् विषाणु रोगों के प्रतिरोधक उत्पन्न किस्म है। फल गुच्छाें में ( 8-10 फल) ऊपर की ओर लगते है। फलाें की लम्बाई 7-8 सै.मी तथा मोटाई लगभग 10-12 प्रतिशत होती है। औसत पैदावार 50-55 क्विंटल प्रति एकड़ है जिससे लगभग 6-8 क्ंविटल लाल सूखी मिर्च प्राप्त की जा सकती है। इस किस्म की मोडी फसल ली जा सकती है।
हिसार विजय (एच.सी.- 28):- शीघ्र पकने वाली, मसाले की, विषाणु रोग की प्रतिरोधक उत्पन्न किस्म है । इसमें भी फल गुच्छों में ऊपर उठे होते हैं। सर्दी में फलों का रंग काला हो जाता है जो पकने के बाद लाल रंग में बदल जाता है। इसके फल पतले व सिरां पर गोल होते हैं। लाल पके फलों में 11 से 12 प्रतिशत ओलेरेसीन होता है । लाल मिर्च व सूखी मिर्च की उपज हिसार शक्ति के समान है। इस किस्म की मोडी फसल भी ली जा सकती है।
कृषि क्रियायें
भूमि की तैयार:- मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है तो भी अच्छी जल-निकाल व्यवस्थ वाली तथा जैवांशों की घनी दुमट मिट्टी इसके लिए सर्वोतम होती है। जमीन 2-3 बार जोत कर व पाटा लगाकर तैयार कर लें। गोबर की खाद पहली जुताई के समय खेत मिलानी चाहिए।
बिजाई का समय:- पौधशाला में बीज की बिजाई मई से जून व अक्तूबर से नवम्बर में की जाती है। बिजाई के 30-35 दिनों के पश्चात् पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। एक एकड़ में पौध रोपाई के लिए लगभग 15-20 क्यारियों (3.0ग1.0 मीटर) की आवश्यकता पड़ती है।
बीज की मात्रा:- 400 ग्राम बीज प्रति एकड़।
पैध तैयार करना:- बिजाई के लिए मई-जून के महिनों में सममतल क्यारियाें बनायें जबकि अक्तूबर-नवम्बर की बिजाई के लिए गहरी क्यारियों के बनाने की सिफारिश की जाती है। क्यारियों में बीज को 2-3 सैं.मी. की दूरी पर कतारों में बोये।
रोपाई :- मिर्च के पौधों की रोपाई डोलियों पर की जाती है। डोलियों की आपसी दूरी 60 सैं.मी. व पौधों में 45 सै.मी. की दूरी रखनी चाहिए।
खाद व उर्वरक:- प्रति एकड़ 10 टन गोबर की खाद, 55 किलोग्राम यूरिया, 25 किलोग्रम डी.ए.पी. और 20 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश (एस.ओ.पी) की शुध्द मात्रा प्रति एकड़ डालें। नाईट्रोजन की 1/3 मात्रा व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय लगायें। शेष नाईट्रोजन खाद की 2/3 मात्रा को रोपाई के महीने पश्चात् फूल आने पर खड़ी फसल में लबायें।
अन्त: कृषि क्रियायें व खरपतवार नियन्त्रण
रोपाई के तुरन्त बाद सिंचाई करें। दूसरी सिंचाई रोपाई के 3-4 दिन पश्चात् करें। खाली स्थानों पर फिर से रोपाई की जानी चाहिए । आगे दी जाने वाली सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती है। दो सिंचाईयों के बीच 8-10 दिन का अन्तराल होना चाहिए। फूल और फल लगने की अवस्थाओं में पानी देना अति आवश्यक है। पहली गुडाई रोपाई के 25-30 दिन के पश्चात् की जानी चाहिए । दूसरी गुडाई फूल आने की अवस्था में करें । खरपतवारों की रोकथाम के लिए पेन्डीमैथालिन 400-500 ग्राम प्रति एकड़ (स्टोम्प 30 प्रतिशत दवा का 1.30-1.75 लीटर) प्रति एकड़ की दर से दर रोपाई के 3-4 दिन पश्चात् छिड़काव करें।
फल व फलों का गिरना:- पौधों की आरम्भिक अवस्था अर्थात अगस्त-सितम्बर के महीनों में पौधो से फूल व फल गिरने लगते हैं। इस समस्या को रोकने के लिए पौधों पर प्लोनोफिक्स के एक मि.ली. दवा व 4 1/2 लीटर पानी के घोल (एन.ए.ए. 10 पी.पी.एम.) का पहला छिड़काव फूल आने की अवस्था में करें व दूसरा छिड़काव के तीन सप्ताह बाद करें।
फसल की कटाई
मिर्च के फलों को बाजार में बेचने हेतु हरी अवस्था में तोड़ना चाहिए। मसाले के लिए फलों को पौधों पर ही पकने व लाल होने दिया जाता है। एक एकड़ भूमि से 3-4 क्ंविटल सूखी लाल मिर्च प्राप्त की जा सकती है।
हानिकारक कीड़े
1. दीमक:- हल्के भूरे रंग के कीट (वर्कर) जमीन में रहकर जड़ों व तनों को काट देते हैं। पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। अधिक प्रकोप सितम्बर से नवम्बर तथा फरवरी-मार्च में होता है।
रोकथाम एवं सावधानियां:- 1. पिछली फसल के अवशेष व ठँठों को निकाल दें। (2) गोबर की कच्ची खाद का प्रयोग न करें।
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